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छाया और धूप

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- यश जैन  

कलयुग का है यह एक रूप 

कही है छाया कही है धूप। 

एक तरफ है सुकून भरी छाया 

दूसरी ओर है धूप की माया। 

 

 

छाया की शीतलता से अनजान 

कई मान बैठे धूप को महान।

थाम लिया धूप का दामन 

सोचा होगा रोशनी का आगमन। 

 

किरणों को मान अपना हथियार 

चल पड़े कुछ चालाक सियार।  

मायाजाल ने कर दिया भ्रमित 

आँखे चौंधियाई और भूले परहित। 

 

छाया ने अनेक बार समझाया 

पर आँखों पर पर्दा था छाया। 

नहीं दिखा उन्हें अन्याय 

धूप का साथ छोड़, कैसे आए ?

 

नहीं हो सकता कभी मिलन 

मान चूका था अब हर मन। 

दिन चढ़ा, बढ़ने लगी रोशनी खुद 

खोने लगा छाया का वजूद।

 

दोपहर में साथ छोड़ देता है साया 

लेकिन ये तो है छाया की माया। 

जैसे ढलेगा दिन और होगी रात 

तब उसे दिखेगी असली औकात। 

 

बढ़ेगा छाया का वर्चस्व चारों ओर

धूप न देख पाएगी अगला भोर। 

फिर सतयुग के हम देखेंगे रूप

 

रहेगी छाया, न होगी धूप।